स्वयं को निर्भार करो।

अपने को भार-मुक्‍त करो। मैं एक सूफी संत की कहानी पढ़ रहा था। वह एक सुनसान रास्‍ते से यात्रा कर रहा था। रास्‍ता निर्जन हो चला था, तभी उसे एक किसान अपनी बैलगाड़ी के पास दिखाई पडा। बैलगाड़ी कीचड़ में फंस गई थी। रास्‍ता उबड़-खाबड़ था। किसान अपनी गाड़ी में सेब भर कर ला रहा था; लेकिन रास्‍ते में कहीं गाड़ी का पिछला तख्‍ता खुल गया था और सेब गिरते गए थे। लेकिन उसे इसकी खबर नहीं थी। किसान को इसका पता नहीं था। जब गाड़ी कीचड़ मे फंसी तो पहले तो उसने उसे निकालने की भरसक चेष्‍टा कि, लेकिन उसके सब प्रयत्‍न व्‍यर्थ गए। तब उसने सोचा कि मैं गाड़ी को खाली कर लूं तो निकालना आसान हो जाएगा।
      उसने जब लौटकर देखा तो मुश्‍किल से दर्जन भर सेब बचे थे। सब बोझ पहले ही उतर चूका था। तुम उसकी पीड़ा समझ सकते हो। उस सूफी ने अपने संस्‍मरणों में लिखा है कि थके-हारे किसान ने एक आह भरी: ‘नरक में गाड़ी फंसी और उतारने को कुछ भी नहीं है।’यही एक आशा बची थी कि गाड़ी खाली हो तो कीचड़ से निकल आएगी। पर अब खाली करने को भी कुछ नहीं है।
 सौभाग्‍य से तुम इस तरह नहीं फंसे हो। तुम खाली कर सकते हो। तुम्‍हारी गाड़ी बहुत बोझिल है। तुम मन को खाली कर सकते हो। और जैसे ही मन गया कि तुम उड़ सकते हो। तुम्‍हें पंख लग जाते है।

ओशो