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किया हुआ ध्यान करना और ध्यान में होना!

एक मित्र ने पूछा है कि किया हुआ ध्यान करना और ध्यान में होना इसमें क्या फर्क है?
ओशो::–वही फर्क है जो मैं समझा रहा हूं। अगर कोई आदमी ध्यान कर रहा है तो वह अशांत मन को शांत करने की कोशिश कर रहा है। वह क्या करेगा? वह यह करेगा कि मन को शांत करने की कोशिश करेगा। और कोई आदमी अगर ध्यान में हो रहा है, तो वह मन को शांत करने की कोशिश नहीं कर रहा है, वह मन से सरका ही जा रहा है। बाहर धूप लग रही है, तो एक आदमी धूप में छाता वगैरह तानने का उपाय कर रहा है। और बाहर धूप में छाते ताने जा सकते हैं, उनमें कोई खड़ा भी हो सकता है और छाया में हो सकता है,। लेकिन मन में छाते ताने ही नहीं जा सकते, क्योंकि मन में सिर्फ विचार के ही छाते तन सकते हैं। उनसे कोई और फर्क नहीं पड़ सकता। यानी वह ऐसा है जैसे कि एक आदमी धूप में खड़ा है और आंख बंद करके सोच रहा है कि ऊपर एक छाता है और धूप अब नहीं लग रही है। लेकिन धूप लगती रहेगी। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह आदमी धूप को शांत करने की कोशिश कर रहा है। यह ध्यान करने की कोशिश कर रहा है। एक दूसरा आदमी है, बाहर धूप आ गई है, उठकर घर के भीतर चला गया है। जाकर घर में विश्राम करने लगा। यह आदमी धूप को शांत करने की कोशिश नहीं कर रहा है। धूप से हटा जा रहा है।
ध्यान करने का मतलब है, एफर्ट, प्रयास—मन को बदलने का। और ध्यान में होने का मतलब है, मन को बदलने का प्रयास नहीं, चुपचाप अपने में सरक जाना।
इन दोनों के फर्क को खयाल में ले लेना चाहिए। क्योंकि अगर आपने ध्यान करने की कोशिश की, तो ध्यान में आप कभी न जा पाएंगे। कोशिश अगर की, चेष्टा अगर की, अगर आप बैठ गए अकड़ कर और आपने कहा कि ध्यान बिलकुल करना ही है। और आपने कहा, आज कुछ भी हो जाए, मन को शांत करके रहेंगे। कौन कह रहा है, यह कौन करेगा, आप ही? आप अशांत हैं और अब आप शांत करेंगे! अब और एक मुसीबत आपने बांधी अपने चारों तरफ। अब आप अकड़े हुए बैठे हैं। आप कहते हैं, कुछ भी हो जाए। अब जितना आप अकड़ते जाते हैं, उतनी परेशानी में पड़ते जाते हैं, उतने स्ट्रेस्ड,उतने टेंस होतै चले जाते हैं।
नहीं, ध्यान करने को…… इसलिए मैं कहता हूं, ध्यान है रिलेक्सेशन, कुछ न करें, शिथिल हो जाएं। समझ लें, एक छोटे से सूत्र से मैं समझा दूं उसे अंतिम रूप से आप ध्यान में रखना।
एक आदमी नदी में तैरता है। तैर रहा है। वह कहता है, मुझे वहा पहुंचना है। नदी की तेज धार है, हाथ — पैर मार रहा है, तैर रहा है, थका जा रहा है, टूटा जा रहा है, लेकिन तैरता चला जा रहा है। यह आदमी प्रयास कर रहा है, एफर्ट कर रहा है तैरने का। तैरना एक प्रयास है। ध्यान करना भी एक प्रयास है। फिर एक दूसरा आदमी है, वह कहता है कि तैरते नहीं, जस्ट फ्लोटिंग, बह रहे हैं। उसने नदी में अपने को छोड़ दिया है। हाथ—पैर भी नहीं तड़फड़ाता है, नदी में पड़ा हुआ है। नदी बही चली जा रही है, वह भी बहा चला जा रहा है। वह तैर ही नहीं रहा है, वह सिर्फ बह रहा है। बहना प्रयास नहीं है, बहना एफर्ट नहीं है। फ्लोटिंग—सिर्फ बहना—अप्रयास, नो एफर्ट है।
मैं जिस ध्यान की बात कर रहा हूं वह फ्लोटिंग जैसा है, स्विमिंग जैसा नहीं—तैरने जैसा नहीं, बहने जैसा है। ध्यान रख लें कि एक आदमी तैरता है और एक पत्ता बह रहा है नदी में। देखें जरा एक तैरते हुए आदमी को और एक बहते हुए पत्ते को। पत्ते की मौज ही और है। न कोई तकलीफ, न कोई अड़चन। न कोई झगड़ा, न कोई झंझट। पत्ता बड़ा होशियार है। पत्ते की होशियारी क्या है? पत्ते की होशियारी यह है कि वह नाव पर सवार हो गया है, नदी को नाव बना लिया है उसने। वह कहता है, जहां चलो, हम वहीं चलने को राजी हैं, ले चलो। उसने नदी की सब ताकत तोड़ दी, क्योंकि नदी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती, वह नदी के खिलाफ लड़ता भी नहीं है। वह विरोध में खड़ा ही नहीं होता, वह कहता है, हम बहते हैं। तो पत्ता बिलकुल राजा है। राजा क्यों है? क्योंकि राजा बनने की कोशिश ही नहीं कर रहा है, बस बहा चला जा रहा है। नदी जहां ले जा रही है, चला जा रहा है। इसको खयाल में ले लेना,एक पत्ते का बहना। क्या आप भी नदी में ऐसे बह सकते हैं? तैरने का खयाल भी न रह जाए, मन भी न रह जाए, भाव भी न रह जाए। क्या आप बह सकते हैं!
तो मैं जिस ध्यान की बात कर रहा हूं वह तैरने जैसा नहीं, बहने जैसा है। बह जाना है। तो इसलिए जब मैं यह कहता हूं कि शरीर को शिथिल छोड़ दें, तो उसका मतलब यह है कि शरीर से बहे हम। अब हम शरीर में कोई पकड़ नहीं रखते, शरीर के किनारे को नहीं पकड़ते। छोड दिया, बहने लगे। मैं कहता हूं कि श्वास को भी छोड़ दें। तो अब हम श्वास के किनारे को भी नहीं पकड़ते हैं, उसको भी छोड देते हैं। उससे भी बहने लगे। जाएंगे कहां? जब शरीर को छोड़ेंगे तो भीतर जाएंगे। और जब शरीर को पकड़ेंगे तो बाहर आएंगे। जब कोई किनारे को पकड़ेगा तो नदी में कैसे जाएगा? किनारे पर आ सकता है बाहर नदी के। जब कोई किनारे को छोड़ेगा, तो किनारे के बाहर तो आ ही नहीं सकता, नदी में ही जाएगा।
तो जीवन की एक धारा बह रही है भीतर, परमात्मा की धारा बह रही है भीतर, चेतना की। वह जो स्ट्रीम ऑफ काशसनेस है, वह भीतर बह रही है। हम पकड़े हुए हैं किनारे को—शरीर के किनारे को। छोड़ दो इसे, श्वास को भी छोड़ दो, विचार को भी छोड़ दो। सब किनारा छूट गया। अब आप कहां जाओगे? अब धारा में बहने लगोगे। और अगर कोई आदमी छोड़ दे धारा में अपने को, तो सागर में पहुंच जाता है।
इधर भीतर जो धाराएं बह रही हैं, वे नदियों की तरह हैं। और जब कोई उसमें बहने लगता है, तो वह सागर में पहुंच जाता है। ध्यान एक बहना है। और जो बहना सीख जाता है, वह परमात्मा में पहुंच जाता है। तैरना मत। जो तैरेगा, वह भटक जाएगा। जो तैरेगा, वह ज्यादा से ज्यादा इस किनारे को छोड़ेगा उस किनारे पहुंच जाएगा। और क्या करेगा? तैरने वाला कर क्या सकता है? इस किनारे से उस किनारे पहुंच जाएगा। यह किनारा भी नदी के बाहर ले जाता है, वह किनारा भी नदी के बाहर ले जाता है। गरीब आदमी बहुत तैरेगा तो अमीर आदमी हो जाएगा। इतना ही हो सकता है न। और क्या होगा! छोटी कुर्सीवाला बहुत तैरेगा तो दिल्ली की किसी कुर्सी पर बैठ जाएगा। और क्या होगा? लेकिन यह किनारा भी बाहर ले जाता है और वह किनारा भी बाहर ले जाता है। द्वारका का किनारा भी उतना बाहर और दिल्ली का किनारा भी उतना ही बाहर। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
नहीं, तैरनेवाला किनारों पर ही पहुंच सकता है। लेकिन बहने वाला? बहने वाले को कोई किनारा नहीं रोक सकता, क्योंकि उसने धार में अपने को छोड़ दिया है। धार उसे ले जाएगी, ले जाएगी, ले जाएगी, सागर में पहुंचा देगी।
सागर में पहुंच जाना ही लक्ष्य है। नदी सागर हो जाए और व्यक्ति की चेतना परमात्मा हो जाए; बूंद, एक —एक बूंद खो जाए उस में, तो जीवन का परम अर्थ और जीवन का परम आनंद और जीवन का परम सौंदर्य उपलब्ध हो जाता है।
मरने की कला बहने की कला है। यह अंतिम बात मरने की कला बहने की कला है। क्योंकि जो मरने को राजी है, वह तैरता ही नहीं; वह कहता है,ले जाओ जहां ले जाना है। हम तो राजी हैं।
मैं मृत्यु सिखाता हूँ ।।
ओशो (प्रवचन–09)
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