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उड़ियो पंख पसार

उड़ियो पंख पसार

 

श्रद्धा के पंख

पृथ्वी को हमने नरक ही तो बना लिया है, नरक से बदतर बना लिया है। और सब इस पूरी विकृति का कारण--सुबह हो गई और हम जागते नहीं।

‘भोर भये परभात, अबहिं तुम करो पयानी।’

अब वक्त आ गया कि तुम चल पड़ो। उठो, यात्रा करो! कौन सी यात्रा? अंतर्यात्रा! मनुष्य होने की यात्रा।  

अभी तुम मनुष्य केवल नाममात्र को हो। बीज-मात्र हो मनुष्य के। इसे वृक्ष बनाना है। वसंत आ गया और तुम बीज की तरह ही पड़े रहोगे? फूटोगे नहीं? अंकुरित नहीं होओगे? पल्लवित नहीं होओगे? फिर फूल कैसे लगेंगे? फिर गंध कैसे आकाश में उड़ेगी?  

ओशो

अध्याय शीर्षक

    Introduction

    #1: श्रद्धा के पंख

    #2: क्रांति का आह्वान

    #3: संन्यास : जीवन का महारास

    #4: तुम बहते जाना भाई

    #5: सत्य की अग्नि-परिक्षा

    #6: श्रद्धा यानी अंतर्यात्रा

 

प्रश्नोत्तर सीरीज के अंतर्गत पुणे में दी गईं दस OSHO Talks


उड़ियो पंख पसार - श्रद्धा के पंख

 

मनुष्य बना ही है आकाश में उड़ने को। न उड़े आकाश में तो फिर पैर घसीट कर ही चलना पड़ेगा। जमीन पर ही चलते रहना मनुष्य के स्वभाव के प्रतिकूल है, अनुकूल नहीं। इसीलिए जीवन इतना बोझिल है, इतना भारग्रस्त है।

जीवन में दुख का एक ही अर्थ है कि हम स्वभाव के अनुकूल नहीं हैं, प्रतिकूल हैं। दुख सूचक है कि हम स्वभाव से चूक रहे हैं; कहीं हम मार्ग से उतर गए हैं; कहीं पटरी से उतर गए हैं। जैसे ही स्वभाव के अनुकूल होंगे, वैसे ही आनंद, वैसे ही अमृत की वर्षा होने लगेगी। लेकिन मनुष्य के पंख पक्षियों जैसे पंख नहीं हैं कि प्रकट हों; अप्रकट हैं। देह के नहीं हैं, चैतन्य के हैं। और जिस आकाश की बात चल रही है, वह बाहर का आकाश नहीं, भीतर का आकाश है--अंतराकाश है। जैसा आकाश बाहर है, वैसा ही आकाश भीतर भी है--इससे भी विराट, इससे भी विस्तीर्ण, इससे भी अनंत-अनंत गुना बड़ा। बाहर के आकाश की तो शायद कोई सीमा भी हो। वैज्ञानिक अभी निश्चित नहीं हैं कि सीमा है या नहीं।

अलबर्ट आइंस्टीन का तो खयाल था कि सीमा है; हम सीमा तक पहुंच नहीं पाए हैं, कभी न कभी पहुंच जाएंगे। क्योंकि विज्ञान की दृष्टि में, कोई भी वस्तु असीम कैसे हो सकती है? वस्तु है तो सीमा होगी ही। सीमा ही तो वस्तु को निर्मित करती है। नहीं तो वस्तु की परिभाषा क्या? अगर असीम हो तो न होने के बराबर हो जाएगी।

लेकिन बाहर के आकाश की बात वैज्ञानिकों पर छोड़ दो। उस गोरखधंधे में अध्यात्म के खोजी को पड़ने की जरूरत भी नहीं है। वह उसकी चिंता का विषय भी नहीं है, न वह उसकी जिज्ञासा है। न निर्णय हो जाए कि बाहर के आकाश की सीमा है या सीमा नहीं है, तो उसे कुछ मिलेगा। उस निष्पत्ति से कुछ सार नहीं है। लेकिन भीतर के आकाश की कोई सीमा नहीं है। यह तो निश्चित हो गया, क्योंकि जो भी भीतर गया है--किसी देश में, किसी काल में--उस सभी का निरपवाद रूप से एक ही अनुभव है, एक ही साक्षात्कार है कि भीतर का आकाश अनंत है। उस भीतर के आकाश में उड़ने की क्षमता लेकर आदमी पैदा होता है; और चलता है बाहर के आकाश में, इससे घसिटता है। क्षमता में और वास्तविकता में मेल नहीं हो पाता। यह जो तालमेल नहीं है, यही हमारा दुख है, यही पीड़ा है, यही संताप है। तालमेल हो जाए, दुख मिट जाए, संगीत का जन्म हो, छंद उपजे, रस बहे, फूल खिलें।

ऐसा ही समझो कि जैसे गुलाब के पौधे में कोई जुही के फूल लगाने की चेष्टा कर रहा हो। न लगेंगे फूल। आए कितना ही वसंत, हो कितनी ही वर्षा, उमड़-घुमड़ मेघ कितने ही मलहार गाएं, माली कितना ही खून-पसीना करे--नहीं, गुलाब में जुही के फूल न लगेंगे, चम्पा के फूल नहीं लगेंगे। गुलाब में तो गुलाब के ही फूल लग सकते हैं। और अगर जुही के फूल लगाने की चेष्टा की तो खतरा यही है कि कहीं ऐसा न हो कि गुलाब के फूल भी न लगें। क्योंकि तुम्हारी चेष्टा तो जुही के लिए होगी। तुम तो लगती हुई कलियों को भी तोड़ डालोगे कि ये तो जुही की नहीं हैं। तुम तो खिलते फूलों को भी नष्ट कर दोगे, क्योंकि वे तुम्हारी अपेक्षाओं के अनुकूल नहीं होंगे, कि वे तुम्हारी आकांक्षाओं के परिपूरक नहीं होंगे।

जो हो सकता है, वही हो सकता है। जो नहीं हो सकता, वह नहीं हो सकता। और मनुष्य की यही दुविधा है, यही संकट है कि वह जो नहीं है, नहीं हो सकता है, वही होने की कोशिश में लगा है। जो है और हो सकता है, उस दिशा में उसकी आंख भी नहीं; उस दिशा में पैर भी नहीं पड़ते; उस दिशा में पंख भी नहीं खोलता। फिर रोता है, छाती पीटता है और हजार-हजार बहाने खोजता है कि शायद इस कारण सुख नहीं है; शायद धन कम है, इसलिए सुख नहीं। मगर बहुत हैं जिनके पास धन है, सुख कहां? सोचता है पद नहीं है, शायद इसलिए सुख नहीं है। फिर बहुत हैं जिनके पास पद भी हैं, पर सुख कहां?

थोड़ा धनियों की आंखों में तो झांको। थोड़ा पद पर जो प्रतिष्ठित हैं उनके प्राणों में तो टटोलो। उनके जीवन को तो थोड़ा परखो, पहचानो। उनके जीवन में भी सुख नहीं है। तो तुम सिर्फ बहाने न खोजते रहो कि समाज की व्यवस्था ठीक नहीं है इसलिए सुख नहीं है, कि आर्थिक वितरण समान नहीं है इसलिए सुख नहीं है। ये सब बहाने हैं। रूस में तो आर्थिक समानता आ गई, सुख नहीं आया। और रूस से मुझे पत्र आते हैं। सुख तो दूर, स्वतंत्रता भी खो गई। पत्र भी चोरी-छिपे आते हैं। पत्र भी सीधे नहीं आ सकते। किसी यात्री को देते हैं लोग कि रूस के बाहर जाकर तुम डाल देना, ताकि पहुंच जाएं। और पत्रों की एक ही पीड़ा है कि हम सुख को कैसे पाएं, ध्यान क्या है, शांति कैसे उपलब्ध होगी!

 

लोग मेरी बात को समझने में अड़चन तो पाएंगे। यह बिलकुल स्वाभाविक है, क्योंकि मैं जो बात कह रहा हूं वह उनकी बंधी-बंधाई धारणाओं के अनुकूल नहीं है। हो भी नहीं सकती उनकी बंधी धारणाओं के अनुकूल। मेरी मजबूरी है, मैं वही कह सकता हूं जिसे मैं सत्य की तरह अनुभव करता हूं। उनकी मजबूरी है, वे उसी को सत्य मान सकते हैं जिसको सदा से सत्य मानते रहे हैं--सत्य हो या न हो। मैं झुक सकता नहीं, क्योंकि सत्य मेरा अपना अनुभव है, कोई उधार बात नहीं। मैं उसमें कोई समझौता कर सकता नहीं। मैं अपनी बात ही कहूंगा। लाख तरकीब से कोई मुझसे पूछे, मैं वही कहूंगा। जिनमें हिम्मत होगी, वे थोड़े से लोग अपनी पुरानी लकीरों को छोड़ कर मेरे साथ चलने को राजी होंगे। मेरी बात पृथकजनों के लिए नहीं है, हो नहीं सकती। केवल थोड़े से आर्यजन!

इसलिए बुद्ध निरंतर कहते थे कि जो आर्य हैं--आर्य का मतलब, जो श्रेष्ठ हैं, जो बुद्धिमान हैं, जो सोच-विचार में कुशल हैं, जिनके जीवन में प्रतिभा है, मेधा है--वे ही केवल समझ सकते हैं धर्म को। इसलिए बुद्ध ने अपने धर्म को आर्य-धर्म कहा है और अपने सत्यों को आर्य-सत्य कहा है।

 

आर्य का अर्थ जाति से नहीं है। आर्य का अर्थ है: प्रतिभाशाली लोग, वे चाहे कहीं पैदा हुए हों। तो जिनमें प्रतिभा है, वे आ रहे हैं सारी दुनिया के कोने-कोने से। वे आएंगे। यह स्थान काबा बनेगा। यहां लाखों लोग आएंगे, मगर सिर्फ प्रतिभाशाली लोगों से ही मेरा संबंध हो सकता है। आम जनता को अड़चन रहेगी, कठिनाई रहेगी। और मैं इससे नाराज नहीं हूं। मैं उनकी मजबूरी समझता हूं। मैं उनका कष्ट समझता हूं। वे भी क्या करें! उनके सारे न्यस्त स्वार्थ, जिनसे बंधे हैं, अगर मेरी बातें मानें तो उनके हर न्यस्त स्वार्थ को धक्का पहुंचने वाला है। अगर मेरी बात मानें तो न तो वे हिंदू रह जाएंगे, न मुसलमान, न ईसाई, न जैन, न बौद्ध। अड़चन हो जाएगी।...

लेकिन साहसी लोग दुनिया में हैं। वे सदा रहे हैं। आखिर कुछ लोगों ने बुद्ध का साथ दिया और कुछ लोगों ने जीसस का साथ दिया, कुछ लोग नानक के साथ खड़े हुए, कुछ लोग कबीर के साथ भी खड़े हुए। वे कुछ लोग मेरे साथ भी खड़े होंगे। मगर ये कुछ लोगों की बातें हैं। धर्म सदा से कुछ लोगों की बातें रहा है, अधिक लोगों के लिए धर्म एक औपचारिकता है, एक सामाजिक शिष्टाचार है। जिनके लिए धर्म सामाजिक शिष्टाचार है, उनके लिए यहां कोई स्थान नहीं है। मेरा उनसे कोई संबंध नहीं हो सकता है। मैं उनके लिए नहीं हूं, वे मेरे लिए नहीं हैं। 

ओशो

पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु:

• हमारी नियति है अंतर्तम के आकाश में उड़ना 

• संन्यास जीवन का त्याग है या कि जीवन जीने की कला?

• जीवन का यथार्थ हमारा क्या है?

• ध्यान है वर्तमान में होने की कला

• आदमी शराब क्यों पीना चाहता है?

• क्या तर्कशास्त्र बिलकुल व्यर्थ है?

• विद्रोह और ध्यान

In this title, Osho talks on the following topics:इस पुस्तक में ओशो निम्नलिखित विषयों पर बोले हैं: श्रद्धा, क्रांति, संन्यास, सत्य, पुनर्जन्म, विद्रोह, ध्यान, त्याग, धारणा, साहस

अधिक जानकारी
Type फुल सीरीज
Publisher ओशो मीडिया इंटरनैशनल
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